Tuesday, April 2, 2019

ये फ़ेक न्यूज़ का जमाना है

भारतीय किसान यूनियन के धर्मेंद्र मलिक कहते हैं, "हिन्दू और मुसलमानों के बीच दंगों के बाद जो दूरियां बढ़ी थीं वो बीजेपी और समाजवादी पार्टी सरकारों का एक प्रोपेगंडा था. इसे दंगे का रूप दिया गया, वो बीजेपी की एक सोची-समझी रणनीति थी कि जाट राजनीति को मुस्लिम से अलग किया जाए. इस दंगे को वो मुस्लिम बनाम जाट बनाने में कामयाब रहे."
लेकिन इस इलाक़े के हिन्दू और मुस्लिम कहते हैं कि इस बार ऐसा नहीं होगा. हालात बदल चुके हैं. हिन्दू-मुस्लिमों के बीच फिर से सद्धभावना का माहौल का बन चुका है.
मुज़फ़्फ़रनगर में सामाजिक कार्यकर्ता असद फ़ारूक़ी कहते हैं, "मुसलमानों और जाटों को अब एहसास हो गया है कि एक का काम दूसरे के बग़ैर नहीं चल सकता. मुस्लिम कामगार जाटों के खेतों में काम करते थे. आज जाटों को मुस्लिम कामगारों की ज़रूरत है और मुसलमानों को जाटों के खेतों में काम करने की ज़रूरत है. आर्थिक दृष्टि से वो एक-दूसरे से अलग नहीं हो सकते."
धर्मेंद्र मलिक के मुताबिक़ उनके संगठन ने दोनों समुदायों के बीच दूरियों को कम करने की पूरी कोशिश की है.
वह कहते हैं, "दोनों बिरादरी को एहसास हुआ कि सत्ता में उनका प्रतिनिधित्व ख़त्म हो चुका है. पिछले साल कैराना में जो लोकसभा का उपचुनाव हुआ उसमें एक बदलाव देखने को मिला कि दोनों समुदायों ने राष्ट्रीय लोक दल की उम्मीदवार तबस्सुम को जिताया."
हमारे साथ बैठे कैराना के बीजेपी समर्थकों ने हुक़्क़े पर कश लेते हुए आश्वासन दिया कि हिन्दू-मुस्लिम दंगे अब नहीं होंगे. शिव कुमार चौहान कहते हैं कि गुर्जर समाज में अब एकता है. वो याद दिलाते हैं कि मुस्लिम गुर्जर 100 साल पहले हिन्दू ही थे. सांस्कृतिक समानता से वो आज भी एक ही समुदाय हैं और एक-दूसरे के त्योहारों और शादियों में शामिल होते रहते हैं.
हो सकता है कि हिन्दू-मुस्लिम दंगे आगे भी हों, सांप्रदायिक तनाव की स्थिति आगे भी पैदा हो, लेकिन जब तक मेरठ वाले हाजी बाबुद्दीन और विपिन कुमार रस्तोगी के बीच कारोबारी निर्भरता बनी रहेगी तब तक इन दंगों और तनावपूर्ण माहौल पर काबू पाना आसान होगा.

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