Friday, April 12, 2019

सीट बचाएगा मोदी का राष्ट्रवाद?

उन्होंने दलील दी थी कि "अगर सरकार काले धन को रोकने के लिए कार्यवाही करे तो क्या कोर्ट को हस्तक्षेप करना चाहिए? ये एक प्रयोग है और इसे कोर्ट से भी समर्थन मिलना चाहिए."
इससे पहले चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि वो इस तरह की फंडिंग के ख़िलाफ़ नहीं है पर चंदा देने वाले शख़्स की पहचान अज्ञात रहने के ख़िलाफ़ है.
हालांकि कोर्ट ने चुनाव आयोग के पिछले हलफ़नामे की याद दिलाई जिसमें इलेक्टोरल बॉड को पीछे ले जाने वाला कदम बताया गया था.
केंद्र सरकार का तर्क है कि वह चंदा देने वाले व्यक्ति की पहचान को लेकर गोपनीयता रखना चाहती है.
इस बीच सोशल मीडिया पर भी इलेक्टोरल बॉड को लेकर लोगों ने प्रतिक्रिया दी है.
एक ट्विटर यूज़ कृष्ण प्रताप सिंह ने ट्वीट किया है, "बीजेपी को इलेक्टोरल बॉड का 90 प्रतिशत मिला है. मुझे लगता है कि बाकी कांग्रेस के खाते में गया है. अगर कांग्रेस इस चुनाव को जीतना चाहती है तो उसे चंदा देने वालों के नाम बताने चाहिए. बीजेपी को छिपने की कोई जगह नहीं मिलेगी."
एक अन्य ट्वीटर यूजर मेघनाद ने लिखा है, "इलेक्टोरल बॉड भारतीय लोकतंत्र के चेहरे पर एक ज़ोरदार तमाचा है."
गुरुवार को भारत के आम चुनाव के पहले चरण में करोड़ों मतदाताओं ने वोट दिए.
नई लोकसभा यानी संसद के निचले सदन के लिए मतदान की प्रक्रिया 11 अप्रैल से शुरू होकर 19 मई तक चलेगी. वोटों की गिनती 23 मई को होगी.
भारत में 90 करोड़ मतदाता हैं. ऐसे में भारत में हो रहा चुनाव दुनिया का सबसे बड़ा चुनाव है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी का मुक़ाबला मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और कई क्षेत्रीय पार्टियों से है.
चुनावों में अहम भूमिका निभाने वाले भारत के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश की दो शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी पार्टियों ने भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ राज्य में गठबंधन किया है.
मतदाताओं की यह संख्या यूरोप और ऑस्ट्रेलिया की कुल जनसंख्या से भी ज़्यादा है.
भारत के लोग उत्साही मतदाता होते हैं. 2014 में हुए पिछले आम चुनावों में 66% मतदान हुआ था. यह पहली बार 1951 में हुए चुनावों के मतदान प्रतिशत (45%) से कहीं अधिक था.
2014 में 464 पार्टियों के 8250 से अधिक उम्मीदवारों ने हिस्सा लिया था. पहले आम चुनावों की तुलना में यह संख्या सात गुनी थी.
2. इसमें लंबा समय लगता है
11 अप्रैल को पहले चरण के तहत वोटिंग हो चुकी और अब 18 अप्रैल, 23 अप्रैल, 29 अप्रैल, 6 मई, 12 मई और 19 मई को वोट डाले जाएंगे.
कई राज्यों में कई चरणों में वोट डाले जा रहे हैं.
1951-52 में हुए भारत के पहले ऐतिहासिक चुनावों को पूरा होने में तीन महीने का समय लगा था. 1962 से लेकर 1989 तक चुनाव चार से 10 दिनों के बीच पूरे किए गए. 1980 में चार दिनों में संपन्न हुआ चुनाव देश के इतिहास का सबसे कम अवधि में हुआ चुनाव है.
भारत में चुनाव प्रक्रिया काफ़ी लंबी होती है क्योंकि पोलिंग स्टेशनों की सुरक्षा के इंतज़ाम करने पड़ते हैं.
स्थानीय पुलिस कई बार राजनीतिक झुकाव रखती नज़र आती है, ऐसे में केंद्रीय बलों की तैनाती की जाती है. इन बलों को पूरे देश में अलग-अलग जगह भेजा जाता है.
3. ख़र्च भी बहुत आता है
भारत के सेंटर फ़ॉर मीडिया स्टडीज़ का अनुमान है कि पार्टियों और उनके उम्मीदवारों ने 2014 के चुनावों में 5 बिलियन डॉलर यानी कि लगभग 345 अरब रुपए ख़र्च किए थे.
अमरीका स्थित थिंक टैंक 'कार्नेज एंडोमेंट फ़ॉर इंटरनेशनल पीस' के साउथ एशिया प्रोग्राम के निदेशक और सीनियर फ़ेलो मिलन श्रीवास्तव कहते हैं, "यह मानना अतिश्योक्ति नहीं कि इस साल यह ख़र्च दोगुना हो जाएगा."

Tuesday, April 2, 2019

ये फ़ेक न्यूज़ का जमाना है

भारतीय किसान यूनियन के धर्मेंद्र मलिक कहते हैं, "हिन्दू और मुसलमानों के बीच दंगों के बाद जो दूरियां बढ़ी थीं वो बीजेपी और समाजवादी पार्टी सरकारों का एक प्रोपेगंडा था. इसे दंगे का रूप दिया गया, वो बीजेपी की एक सोची-समझी रणनीति थी कि जाट राजनीति को मुस्लिम से अलग किया जाए. इस दंगे को वो मुस्लिम बनाम जाट बनाने में कामयाब रहे."
लेकिन इस इलाक़े के हिन्दू और मुस्लिम कहते हैं कि इस बार ऐसा नहीं होगा. हालात बदल चुके हैं. हिन्दू-मुस्लिमों के बीच फिर से सद्धभावना का माहौल का बन चुका है.
मुज़फ़्फ़रनगर में सामाजिक कार्यकर्ता असद फ़ारूक़ी कहते हैं, "मुसलमानों और जाटों को अब एहसास हो गया है कि एक का काम दूसरे के बग़ैर नहीं चल सकता. मुस्लिम कामगार जाटों के खेतों में काम करते थे. आज जाटों को मुस्लिम कामगारों की ज़रूरत है और मुसलमानों को जाटों के खेतों में काम करने की ज़रूरत है. आर्थिक दृष्टि से वो एक-दूसरे से अलग नहीं हो सकते."
धर्मेंद्र मलिक के मुताबिक़ उनके संगठन ने दोनों समुदायों के बीच दूरियों को कम करने की पूरी कोशिश की है.
वह कहते हैं, "दोनों बिरादरी को एहसास हुआ कि सत्ता में उनका प्रतिनिधित्व ख़त्म हो चुका है. पिछले साल कैराना में जो लोकसभा का उपचुनाव हुआ उसमें एक बदलाव देखने को मिला कि दोनों समुदायों ने राष्ट्रीय लोक दल की उम्मीदवार तबस्सुम को जिताया."
हमारे साथ बैठे कैराना के बीजेपी समर्थकों ने हुक़्क़े पर कश लेते हुए आश्वासन दिया कि हिन्दू-मुस्लिम दंगे अब नहीं होंगे. शिव कुमार चौहान कहते हैं कि गुर्जर समाज में अब एकता है. वो याद दिलाते हैं कि मुस्लिम गुर्जर 100 साल पहले हिन्दू ही थे. सांस्कृतिक समानता से वो आज भी एक ही समुदाय हैं और एक-दूसरे के त्योहारों और शादियों में शामिल होते रहते हैं.
हो सकता है कि हिन्दू-मुस्लिम दंगे आगे भी हों, सांप्रदायिक तनाव की स्थिति आगे भी पैदा हो, लेकिन जब तक मेरठ वाले हाजी बाबुद्दीन और विपिन कुमार रस्तोगी के बीच कारोबारी निर्भरता बनी रहेगी तब तक इन दंगों और तनावपूर्ण माहौल पर काबू पाना आसान होगा.